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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

अयत्नोपनतेऽप्यक्षि पदार्थेषु यथा पुनः । नीरागमेव पतति तद्वत्कार्येषु धीरधीः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बिना किसी यत्न के बनाये हुए पर्वत, वन, तालाब आदि में स्थित पेड़, झाड़ी, कमल आदि पदार्थों में ममता न होने से उनका छेदन, भेदन, अपहरण आदि देखने पर भी दुःख न होने के कारण उनमें आँख प्रेम रहित ही गिरती है, वैसे ही विद्वान पुरुष की बुद्धि भी अपने पुत्र, मित्र आदि के व्यवहार कार्यो में भी अनुराग रहित ही रहती है