Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
करोत्यविरतं स्नानं बहिरन्तरवीक्षणात् ।
सरित्संगमतीर्थेषु मनोरथगतः क्रमात् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
वह मानस ब्रह्माकारवृत्ति मेँ आरूढ होकर बाहर और भीतर परमात्मा के दर्शन से आधिभौतिक और
आध्यात्मिक नदियों के संगम तीर्थो में सदा स्नान करता हे ।
कहा भी है :
स्नातं तेनसमस्ततीर्थसलिले सर्वाऽपि दत्ताउवनि।
यज्ञानां च कृतं सह्रमयुतं देवाश्च सम्पूजिताः ॥
संसाराच्च समुद्धृताः स्वपितरः सर्वस्व पूज्यो ह्यसौ ।
यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपि प्राप्तं हि धैर्य मन:॥
(जिसका ब्रह्मविचार में एक क्षण भी मन स्थिर हुआ उसने सब तीर्थ जलो में स्नान कर लिया,
सम्पूर्ण पृथ्वी का दान कर दिया, हजारों यज्ञ कर डाले, दशो हजार देवताओं की पूजा की, संसार से
अपने पितरों का उद्धार कर दिया ओर सबका पूज्य बन गया )