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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

आत्मन्येव न मात्यन्तः स्वात्मनात्मनि जृम्भते । संपूर्णोऽपारपर्यन्तः क्षीरार्णव इवार्णवे ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

पामरों की दृष्टि से स्वराज्य दृष्टान्त हो सकता है, तत्त्वज्ञ की दृष्टि से तो वह दृष्टान्त नहीं हो सकता, क्योकि उसमें परिच्छेद नहीं है, इस आशय से कहते है। जैसे अपार क्षीर सागर सागर में ही वृद्धि को प्राप्त होता है, वैसे ही परिपूर्ण अपरिच्छिन्न आत्मज्ञानी आत्मा में ही नहीं समाता, आत्मा में आत्मा से ही वृद्धि को प्राप्त होता हे