Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
चिरं पूरितसर्वाशः सर्वसंपत्तिसुन्दरः ।
अपुनःखण्डनायेन्दुः पूर्णाङ्ग इव राजते ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वर्गीय लोग नारकीय लोगों के दुःख को देखते हैं वैसे ही ज्ञानी अज्ञानियों के दुःख को देखते
हैं, ऐसा कहते हैं।
जैसे आकाश में उदित हुआ सूर्य वन बगैरह को देखता है वैसे ही वह लताओं से वन की तरह
परस्पर वेष्टित होकर स्थित हुए तथा दुःखरूपी आरे से काटे हुए सब पीड़ित लोगों को देखता है ॥ ३ ८॥
जिसके सम्पूर्ण मनोरथ चिरकाल तक पूर्ण हो गये है एवं सब सम्पत्तियों से सुन्दर ज्ञानी पुरुष परिपूर्ण
स्वरूपवाले चन्द्रमा के समान पुनः क्षीण न होने के लिए शोभित होता है