Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
विद्यमानं घटं वायुः किंचित्स्पृशति नास्थितम् ।
यथा तथैव देही स्वां शरीरनगरीमिमाम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस शरीररूपी नगरी का विद्यमान दशा में भी भलीभोति स्पर्श नहीं होता, उसका नाश होने पर
स्पर्श नहीं होता, इसमें कहना ही क्या है ? ऐसा दृष्टान्त से कहते हैं।
जैसे वायु विद्यमान घड़े का कुछ स्पर्श करता है, अविद्यमान घड़े का स्पर्श कुछ नहीं करता, वैसे ही
देही विद्यमान ही अपनी इस शरीर नगरी का कुछ स्पर्श करता हे । उसके अविद्यमान होने पर तो कुछ भी
स्पर्श नहीं करता