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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

उदरश्वभ्रनिक्षिप्तस्वान्नेष्टा भक्ष्यतत्परा । दीर्घकण्ठबिलोद्गीर्णवातसंरम्भशब्दिता ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

इसमें उदर रूपी गर्त में रक्खे हुए अपने प्रारब्ध से प्राप्त अन्न ही धन, अन्न, धान्यआदि ओर वसन, आभरण आदि प्रिय वस्तुएँ हैं । अनिषिद्ध उपभोग का विस्तार करनेवाले जिह्वा, श्रोत्र आदि इसमें सिररूपी महल के झरोखों में बैठे हुए नागरिक हैँ । विशाल ओर ऊपर को मुख किया हुआ जो गले का छिद्र है, उसके द्वारा ऊपर को निकलता हुआ जो प्राणवायु है, उसके शब्द से यह मुखरित है