Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
हस्तं हस्तेन संपीड्य दन्तैर्दन्तान्विचूर्ण्य च ।
अङ्गान्यङ्गैरिवाक्रम्य जयेश्चेन्द्रियशात्रवान् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए चिरकाल के निग्रह से ओर तत्त्वबोध से समूल मन की जय के लिए पहले इन्द्रिय जय ही
सम्पूर्ण प्रयत्न से करना चाहिये ऐसा कहते है ।
हाथ को हाथ से दबाकर, दतो को दाँतों से पीसकर, अंगों से ही अंगों को तोड़-मरोड़ कर इन्द्रियरूपी
शत्रुओं पर विजय प्राप्त करे