Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
ताडितस्य हि यः पश्चात्संमानः सोऽप्यनन्तकः ।
शालेर्ग्रीष्माभितप्तस्य कुसेकोऽप्यमृतायते ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे दण्ड देने से पीड़ित हुआ मन रुठे हुए बालक की नाई आत्मा मेँ भी अनुरक्त नहीं
होगा, तो उस पर कहते हैं।
पहले खूब ताडित हुए मन का पीछे जो थोडा सा सन्मान है, वह भी असीम हो जाता है । देखिये न,
ग्रीष्म ऋतु में खूब सन्तप्त हुए धान के पौधों के लिए साधरण सा जल भी अमृत का काम कर देता हे ।
भाव यह है कि चिरकाल तक उन्माद से लालित मन का एक बार निग्रह करने पर फिर निग्रह का त्याग
करने पर ऐसा होता है, चिरकाल के निग्रह से निराश किये हुए मन का बालक की नाई रूठना सम्भव
नहीं हे