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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 45

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

इन्द्रियाणां न हरति प्राप्तमर्थं कदाचन । नाददाति तथाऽप्राप्तं संपूर्णो ज्ञोऽवतिष्ठते ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसा है, तो ज्ञानी प्रवृत्ति मे क्यों पडता है ? इस पर कहते हैं। इन्द्रियों को प्रारब्ध से प्राप्त हुए विषय का ही कभी वरण नहीं करता और अप्राप्त वस्तु को प्रयत्न के साथ ग्रहण नहीं करता यानी यथा प्राप्त के उपयोग से अपनी आजीविका चलाता है, इस प्रकार ज्ञानी परिपूर्ण होकर स्थित रहता है