Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
पूर्णस्तु प्राकृतोऽप्यन्यत्पुनरप्यभिवाञ्छते ।
जगत्पूरणयोग्याम्बुर्गृह्णात्येवार्णवो जलम् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
परिपूर्ण हुआ भी प्राकृत पुरुष
फिर भी अधिक की इच्छा करता ह । संसार के भरने योग्य जलवाला समुद्र ओर जल चाहता ही है