Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 23, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 23 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
य उत्तमपदालम्बी चक्रभ्रमवदास्थितः ।
शरीरनगरीराज्यं कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ १ ॥
तस्येयं भोगमोक्षार्थं तज्ज्ञस्योपवनोपमा ।
सुखायैव न दुःखाय स्वशरीरमहापुरी ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवन्मुक्त के शरीररूपी नगरी राज्य का वर्णन करनेवाले श्रीवसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी के तदुपयोगी
प्रश्न का उत्थान कराते हैँ ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, जैसे घटोत्पत्तिरूप कार्य हो जाने पर भी कुम्हार का
चक्र जब तक वेग रहता है तब तक घूमता रहता है वैसे ही जब तक प्रारब्ध का क्षय न हो जाय तब तक
देह धारण-व्यवहार मेँ स्थित जीवन्मुक्तिरूप उत्तम पद में वर्तमान जो जीवन्मुक्त पुरुष शरीररूपी
नगरी में राज्य करता हुआ भी उसके फल से लिप्त नहीं होता । क्रीडाविनोद हेतु होने के कारण उपवन
के सदुश यह शरीररूपी महापुरी उस ज्ञानी के भोग और मोक्ष के लिए है । एकमात्र सुख ही इससे होता
है, राजधानी में रहनेवाले राजा के तुल्य दुःख नहीं होता
सर्ग सन्दर्भ
बाईसवाँ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग ज्ञानी का शरीररूपी नगर में राज्यवर्णन, आसक्तिरहित सद्भोगों से विनोद ओर मनोजयरूपी सुख के उदय का वर्णन ।