Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 57
रछूप्पनवाँ सर्ग समाप्त सत्तावनवों सर्ग दूसरी लीला का दर्शन, लीला के देह की असत्यता ओर योगियों के शरीर में आतिवाहिकता के उदय का वर्णन ।
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- Verses 1–8श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, श्रीरामजी, तदुपरान्त वहाँ पर उन्होने विदूरथकी शवशय्या के एक छ…
- Verse 9उन दोनों ने उस सुन्दरीको (द्वितीय लीला को) देखा, पर उसने उनको नहीं देखा, क्योकि वे दोनों…
- Verses 10–11लीला ने पहले जिस स्वरूप को छोड़ा था, उसे उसीका अन्वेषण करना चाहिए था, क्योकि वह आवश्यक था…
- Verses 12–13आतिवाहिकता बुद्धि का उदय होने से एवं तत्त्वज्ञान से उस देह के बाधित होने के कारण ही लीला…
- Verse 14जैसे-जैसे यह पूर्वलीला क्रमश: बोध में परिपक्वतारूप परिणाम को प्राप्त हुई, वैसे-वैसे बोध स…
- Verse 15(आतिवाहिक देहवाले को समय पाकर रस्सी में सर्प की नाई “मेँ आधिभौतिक देहवाला हूँ ।” ऐसा भ्रम…
- Verse 16भूमि आदि रूप आधिभौतिक प्रपंच खरगोश के सींग की नाई वास्तविक रूप से न शब्दतः ओर न अर्थतः ही…
- Verse 17जिस मनुष्य को स्वप्न में मैं हरिण हूँ, ऐसी बुद्धि हुई, वह क्या अपनी मृगता का विनाश होने प…
- Verse 18भ्रान्त पुरुष की दृष्टि में भ्रमवश असत्य वस्तु का तुरन्त आविर्भाव होता है और सत्य वस्तु त…
- Verse 19यों अज्ञ मन की समष्टि ने ही इस आधिभौतिक प्रपंच की कल्पना कर रक््खी है, ऐसा फलितार्थ कहते…
- Verse 20सभी अज्ञ पुरुष, जो कि जन्म और मरण से युक्त देहको ही आत्म समझते हैं, स्वप्न के तुल्य प्राप…
- Verse 21नहीं है तो जब वह जीवित रहता है या आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है यानी मुक्ति को प्राप्त हो…
- Verse 22योगियों का मरना दो प्रकार का होता है एक तो प्रारब्धभोग के लिए अपनी इच्छानुसार विविध शरीरो…
- Verse 23दूसरे में भी पूर्वदेह का परिशेष नहीं रहता है, यह दरष्टान्तपूर्वक कहते है । जैसे धूप में ह…
- Verse 24धीरे-धीरे क्षय को प्राप्त होता है ओर अन्य लोग उसे देखते हैं, इसमें भी कोई नियम नहीं है, क…
- Verse 25अथवा इस विषय को यों हृदयंगम करना चाहिये कि यद्यपि योगी जनों को अपनी दृष्टि से अपने शरीर क…
- Verse 26दूसरी बात यह है कि योगियों को जब ज्ञानप्राप्ति होती है, उसी समय उनकी देह आदि का बाध हो जा…
- Verse 27हे श्रीरामचन्द्रजी, जरा ध्यान देकर विचार तो कीजिये देह क्या थी, किसकी थी, किसकी सत्ता रही…
- Verse 28श्रीवसिष्ठजी के उक्त कथन से श्रीरामचन्द्रजी को यह शंका हुई कि यदि योगियों की देह बाधित हो…
- Verse 29त्रिवृत्करण श्रुति सूक्ष्मदेह से उपहित ब्रह्म मे स्थूल शरीर के अध्यास का बाध कराती है श्र…
- Verse 30आतिवाहिक देहके ही अभ्यास से वह आधिभौतिकता बुद्धि प्राप्त होती है जब आधिभौतिकता बुद्धि शान…
- Verse 31तब प्रबुद्ध पुरूष के निर्मल बोध से गुरुता, कठिनता इत्यादि का जो असत् आग्रह है वह भी, स्व…
- Verses 32–33जैसे स्वप्न में यह स्वप्न है, इस ज्ञान से क्लेश आदि का भार हल्का हो जाता हे वैसे ही तब यो…
- Verses 34–38जैसे स्वप्न में यह स्वप्न है, इस परिज्ञान से शरीर हल्का हो जाता हे वैसे ही बोध होने से स्…
- Verse 39स्वप्न में संकल्पात्मा ही हूँ स्थूलस्वरूप नहीं हूँ, ऐसी (५६) स्मृति के उदित होने पर जैसे…
- Verse 40यदि यह शंका हो कि दूसरी लीला पहले- पहल आई थी, अतः उसके विषय में यह कौन है, कहाँ से आईं है…
- Verse 41उनके विचार के अनुदय में हेतु क्या है, ऐसा यदि कोड कहे, तो स्थूल मे अभिनिवेश तथा सार, दार्…
- Verse 42जो विचार करते हैं, उनमें क्रमशः आधिभौतिकता की प्रतीति बोध से बाधित हो जाती है, अतः उनमें…
- Verse 43दृष्टान्त प्रसंग से श्रीरामचन्द्रजी स्वाप्नविषय का मूलाज्ञान के बाध के बिना आत्यन्तिक बाघ…
- Verse 44स्वप्न जगत् और मनोरथजन्य प्रपंच जाग्रत् वासना से संचित अविद्या से उपहित जीव की संवित्…
- Verse 45जैसे स्पन्दरहित वायु के अन्दर वह स्पन्द विलीन हो जाता है वैसे ही अनन्यस्वरूप (अन्य तात्त्…
- Verse 46स्वप्न आदि पदार्थो के अवभास से संवित् ही खूब स्फुरण को प्राप्त होती हे स्फुरण को प्राप्त…
- Verse 47जैसे द्रवत्व और जल में भेद नहीं है और जैसे स्पन्द (चलन) ओर वायु में भेद नहीं है वैसे ही स…
- Verse 48जो उसमें अन्य-सा प्रतीत होता है, वह अविद्या ही है, वही संसार है, ऐसा कहते है । जो उसमें अ…
- Verses 49–50सहकारी कारणों का अभाव होने से स्वप्न मे संवित् ओर स्वप्न के पदार्थो का भेद निरर्थक ही हे…
- Verse 51यदि ऐसी बात है तो सहकारी कारणवाले जगत् प्रपच में सत्यता प्राप्त हुई ? इस शंका का समाधान…
- Verse 52"तत्त्वज्ञान से बाध्य होने के कारण भी यह प्रपव सत्य नहीं है, ऐसा कहते है । जैसे जागरण होन…
- Verse 53ऐसी अवस्था में श्रीशुकदेवजी का सूर्यमण्डलगमन और दधीचि आदि ऋषियों के मृतक शरीर का दर्शन लो…
- Verse 54उक्त अर्थ को अनुमानप्रमाण से भी ढढ कर रहे श्रीवस्रिष्ठजी दो श्लोकों से प्रकरण का उपसंहार…
- Verse 55पूर्व -पूर्व पदार्थों के भेदरूपी भ्रम का दर्शन करनेवाले पुरुष में दृढ़तर भेदसंस्कार का उद…