Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
क्वासील्लीलाशरीरं तत्कुतस्तस्यास्ति सत्यता ।
केवला भ्रान्तिरेवाभूज्जलबुद्धिर्मराविव ॥ १२ ॥
आत्मैवेदं जगत्सर्वं कुतो देहादिकल्पना ।
ब्रह्मैऽवानन्दरूपं सद्यत्पश्यसि तदेव चित् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
आतिवाहिकता बुद्धि का उदय होने से एवं तत्त्वज्ञान से उस देह के बाधित होने के कारण
ही लीला द्वारा अपनी देह के दर्शन का वर्णन नहीं किया । जिनकी (अज्ञानियों की) दृष्टि से वह
बाधित नहीं हुआ, उनकी दृष्टि से अग्रिम सर्ग में उस देह के मरण, दाह आदि का वर्णन किया
जायेगा । इस प्रकार वक्ष्यमाण उस देह के मरण, दाह आदि को छिपाकर तत्वज्ञान कराने के
लिए उसकी असत्यता का ही प्रतिपादन कर रहे श्रीवस्रिष्ठजी ने उत्तर दिया ।
श्री वसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, लीला का वह शरीर था ही कहाँ ? फिर
उसकी सत्यता की बात ही कैसे ? मरूभूमि में जलबुद्धि (जल की भ्रान्ति) के तुल्य वह भ्रान्ति
ही थी । यह सम्पूर्ण जगत आत्मा ही है, ऐसी दशा में देह आदि की कल्पना कैसी ? जो कुछ
आप देखते हैं वह आनंदरूप सदृब्रह्म ही है, वही चित् है