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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

समस्तस्याप्रबुद्धस्य मनोजातस्य कस्यचित् । बीजं विना मृषैवेयं मिथ्यारूढिमुपागता ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

यों अज्ञ मन की समष्टि ने ही इस आधिभौतिक प्रपंच की कल्पना कर रक्‍्खी है, ऐसा फलितार्थ कहते हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्ड के भिन्न-भिन्न असंख्य मनसमूहों के मध्य में किसी एक मन-समूह की यह यानी इस ब्रह्माण्ड की स्थूलत्वभ्रान्ति वृथा प्रसिद्धि को प्राप्त हुई है और वह मिथ्या एवं निर्बीज है