Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 47
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 47 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
संवित्स्वप्नार्थयोर्द्वित्वं न कदाचन लभ्यते ।
यथा द्रवत्वपयसोर्यथा वा स्पन्दवातयोः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे द्रवत्व और जल में भेद नहीं है और जैसे स्पन्द (चलन) ओर वायु में भेद नहीं
है वैसे ही संवित् और स्वाप्न पदार्थो में भेद कदापि नहीं पाया जाता है । भाव यह है कि संवित्
ही अज्ञात होकर कर्मवश कभी स्वाप्निक पदार्थो के रूप में स्फुरित होती है, विवेक होने पर
स्वाप्न पदार्थ ओर संवित् में कोई अन्तर नहीं रहता