Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वप्नभ्रमेऽथ संकल्पे पदार्थाः पर्वतादयः ।
संविदोऽन्तर्मिलन्त्येते स्पन्दनान्यनिले यथा ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न जगत् और मनोरथजन्य प्रपंच जाग्रत् वासना से संचित अविद्या से उपहित जीव
की संवित् से उत्पन्न है, इसलिए जिससे उसकी उत्पत्ति है, उसीमे उसका तिरोभाव होता है,
ऐसा श्रीवसिष्ठजी समाधान करते है।
स्वप्नभ्रान्ति मेँ ओर मनोरथ में पर्वत आदि पदार्थ से स्पन्दन (गति) वायु में अन्तर्भूत
होते है वैसे ही संवित् के अन्दर विलीन हो जाते हैं