Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
आतिवाहिकदेहेन दृश्यं यदवलोकितम् ।
भूम्यादि नाम तस्यैव कृतं तच्चाधिभौतिकम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
(आतिवाहिक देहवाले को समय
पाकर रस्सी में सर्प की नाई “मेँ आधिभौतिक देहवाला हूँ ।” ऐसा भ्रम उदय हुआ है।) (>)
केवल उसी देह की आधिभौतिकता बाधित नहीं हुई, किन्तु भूमि आदि सम्पूर्ण वस्तुओं
की भी आधिभौतिकता नष्ट हो गई । 'अपागादरनेरग्नित्वं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्” (अग्नि
की अग्निता गई, शुक्ल, कृष्ण और रक्त-ये तीन रूप ही सत्य हैं, यानी इन तीन रूपों से
अतिरिक्त अग्नि में जो अग्नित्व की प्रतीति तुम्हें हुई थी, वह नहीं रही) इस श्रुति से उनकी
स्थूलता का बाध होने से केवल आतिवाहिकता अवशिष्ट रहती है, इस आशय से कहते हैं।
आतिवाहिकताबुद्धि से यानी सूक्ष्मतम समष्टिमनोमात्रत्वबुद्धि से तत्त्वदृष्टि द्वारा लीला ने
जो दृश्य देखा, उसीका पहले भ्रान्ति से पृथिवी आदि नाम रक्खा, वही आधिभौतिक है