Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verses 1–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verses 1–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 1-8
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततो ददृशतुस्तत्र शवशय्यैकपार्श्वगाम् ।
लीलां विदूरथस्याग्रे मृतां ते प्रथमागताम् ॥ १ ॥
प्राग्वेषां प्राक्समाचारां प्राग्देहां प्राक्सवासनाम् ।
प्राक्तनाकारसदृशीं सर्वरूपाङ्गसुन्दरीम् ॥ २ ॥
प्राग्रूपावयवस्पन्दां प्रागम्बरपरीवृताम् ।
प्राग्भूषणभरच्छन्नां केवलं तत्र संस्थिताम् ॥ ३ ॥
गृहीतचामरां चारु वीजयन्तीं महीपतिम् ।
उद्यच्चन्द्रामिव दिवं भूषयन्तीं महीतलम् ॥ ४ ॥
मौनस्थां वामहस्तस्थवदनेन्दुतया नताम् ।
भूषणांशुलतापुष्पैः फुल्लामिव वनस्थलीम् ॥ ५ ॥
कुर्वाणां वीक्षितैर्दिक्षु मालत्युत्पलवर्षणम् ।
सृजन्तीमात्मलावण्यादिन्दुमिन्दुं नभोदितम् ॥ ६ ॥
नरपालात्मनो विष्णोर्लक्ष्मीमिव समागताम् ।
उदितां पुष्पसंभारादिव पुष्पाकरश्रियम् ॥ ७ ॥
भर्तुर्वदनके न्यस्तदृष्टिमिष्टविचेष्टिताम् ।
किंचित्प्रम्लानवदनां म्लानचन्द्रां निशामिव ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, श्रीरामजी, तदुपरान्त वहाँ पर उन्होने विदूरथकी शवशय्या
के एक छोर पर स्थित लीला को देखा, जो पहले मरी थी ओर उनसे पहले आ गई थी, उसका
हूबहू पहले का-सा वेष, पहले का-सा आरचण ओर पहले का-सा ही शरीर था, क्योकि
पहले उसमें वैसी ही वासनाएँ थी । उसकी आकृति भी पूर्वजन्म की आकृति से सर्वथा मिलती
थी, रुपवान् सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगों से वह युक्त थी, पहले के जैसे उसके अवयव ओर चेष्टा
थी, जैसे पूर्वजन्म में उसने वस्त्र पहन रक्खे थे, वैसे ही वस्त्रों से उसका तन ढका था, पूर्वजन्म
के ही सदुश आभरणो से वह विभूषित थी, केवल अन्तर इतना ही था कि पहले वह राजा
विदूरथ के घर में थी, अब राजा पद्म के घर में स्थित थी | वह चँवर लिए हुए थी और बड़ी
सुरुचि से राजा के ऊपर चँवर डला रही थी, जिसमें चन्द्रमा उदित हो रहे हों, एसे द्यलोककी
नाई वह पृथिवी को जगमगा रही थी, वह मौन थी, उसने अपने चन्द्रवदन को बायें हाथ की
हथेली के सहारे लटका रक्खा था, अतएव वह एक ओर को कुछ नमी हुई थी, आभूषणों के
किरणरूपी पत्र, लता और पुष्पों से वनस्थली-सी थी, अपने दर्शनों से (दृष्टिपातं से) मानों
मालती के फूल और नीलकमलों की वृष्टि कर रही थी, अपने अंग-प्रत्यंगों के लावण्य से
आकाश में उदित सब चन्द्रमाओं की सृष्टि कर रही थी, राजा पद्मरूपी विष्णु की लक्ष्मी के
सदश थी, पुष्पों की राशि से उदित हुई वसन्तशोभा के तुल्य थी, अपने पति के मुखकमल को
टकटकी लगाकर देख रही थी, उसकी सभी चेष्टाएँ रम्य थी, मुखचन्द्र कुछ मलिन था, अतएव
वह जिस रात्रिमें चन्द्रमा मलिन हो, उस रात्रिके तुल्य थी
सर्ग सन्दर्भ
रछूप्पनवाँ सर्ग समाप्त सत्तावनवों सर्ग दूसरी लीला का दर्शन, लीला के देह की असत्यता ओर योगियों के शरीर में आतिवाहिकता के उदय का वर्णन ।