Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verses 49–50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verses 49–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
सहकारिकारणानामभावे किल कीदृशी ।
संवित्स्वप्नपदार्थानां द्विता स्वप्ने निरर्थिका ॥ ४९ ॥
यथा स्वप्नस्तथा जाग्रदिदं नास्त्यत्र संशयः ।
स्वप्ने पुरमसद्भाति सर्गादौ भात्यसज्जगत् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
सहकारी कारणों का अभाव होने से स्वप्न मे संवित्
ओर स्वप्न के पदार्थो का भेद निरर्थक ही हे । भाव यह कि स्वाप्निक पदार्थ लोकप्रसिद्ध दण्ड,
चक्र आदि सहकारी कारणों से उत्पन्न न होने के कारण भी असत् है