Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
पुंसो हरिणकोऽस्मीति स्वप्ने यस्योदिता मतिः ।
स किमन्विष्यति मृगं स्वमृगत्वपरिक्षये ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस मनुष्य को स्वप्न में मैं हरिण हूँ, ऐसी बुद्धि हुई,
वह क्या अपनी मृगता का विनाश होने पर मृग को खोजता है। भाव यह है कि बाधित वस्तु के
अन्वेषण में किसीकी प्रवृत्ति ही नहीं हो सकती