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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

स्वप्नोपलम्भं सर्गाख्यं स सर्वोऽनुभवन्स्थितः । चिरमावृत्तदेहात्मा भूचक्रभ्रमणं यथा ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

सभी अज्ञ पुरुष, जो कि जन्म और मरण से युक्त देहको ही आत्म समझते हैं, स्वप्न के तुल्य प्राप्त होनेवाली इस सृष्टि का अनुभव करते रहते हैं, जैसे कि चक्कर काटता हुआ बालक भूमि के मण्डल के भ्रमण का अनुभव करता है