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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एवं ज्ञास्यन्ति ते राज्ञी स्थितेयमिह दुःखिता । वयस्या काचिदन्येयं कुतोऽप्यस्या उपागता ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्न में संकल्पात्मा ही हूँ स्थूलस्वरूप नहीं हूँ, ऐसी (५६) स्मृति के उदित होने पर जैसे (यानी अपनी इच्छा के अनुसार आकाश में विहार करने में समर्थ) शरीर प्राप्त होता है वैसे ही यह सूक्ष्म शरीर भी योगी को बोध से प्राप्त होता है ॥ ३ ६॥ यदि किसीको यह शंका हो कि अपनी देह तो सबको परम प्रिय है, उसका नाश करनेवाला ज्ञान अनर्थ नही है, तो और क्या है 2 उस पर कहते हैं। जैसे रस्सी में सर्प की प्रतीति भ्रान्ति है, वैसे ही यह स्थूलदेहप्रतीति भ्रम ही है। उस भ्रम के नष्ट होने पर अपना क्या नष्ट हुआ और उत्पन्न होने पर अपना क्या उत्पन्न हुआ ? भाव यह कि शुक्तिरजत का विनाश होने पर क्या कभी कोई शोक करता है २।३७॥ इस प्रकार प्रासंगिक वस्तु का निर्णय होने पर प्रस्तुत कथा के विषय में ही श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं । हे प्रभो, पूर्व लीला और नूतन लीला का पद्म के घर में समागम होने के बाद पद्म के घर में रहनेवाले लोग लीला को, जो आतिवाहिक देह होने के कारण दिखाई नहीं दे सकती थी, ये लोग मुझे देखें, इस सत्यसंकल्प के कारण यदि देखते हैं, तो उसके बाद उसे क्या समझते हैं ? क्या यह वही पूर्व पद्मपत्नी है, यह जानते हैं, अथवा कोई अपूर्व देवी आ गई है, यों ज्येष्ठशर्मा आदि के समान विस्मययुक्त हुए, यह अर्थ है॥ ३ ८॥ श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, वे लोग यह रानी यहाँ दुःख-पूर्वक स्थित है, इसकी यह दूसरी सखी कहीं से आ गई है, ऐसा जानते हैं