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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verses 32–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verses 32–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

लघुतूलसमापत्तिस्ततः समुपजायते । स्वप्ने स्वप्नपरिज्ञानादिव देहस्य योगिनः ॥ ३२ ॥ स्वप्ने स्वप्नपरिज्ञानाद्यथा देहो लघुर्भवेत् । तथा बोधादयं देहः स्थूलवत्प्लुतिमान्भवेत् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में यह स्वप्न है, इस ज्ञान से क्लेश आदि का भार हल्का हो जाता हे वैसे ही तब योगी का शरीर हल्का रूई के फाहे के सदुश हो जाता है यानी वह सर्वत्र गमन में समर्थ हो जाता है