Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
बहुशो ह्युक्तमेतत्ते न गृह्णासि किमुत्तम ।
आतिवाहिक एवास्ति नास्त्येवेहाधिभौतिकः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
त्रिवृत्करण श्रुति सूक्ष्मदेह से उपहित ब्रह्म मे स्थूल शरीर के अध्यास का बाध कराती है
श्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्“ इस श्रुति से स्थूल का बाध होने पर सूक्ष्म का परिशेष कहा गया है,
इसलिए जो दोष आपने दशया उसके लिए वहाँ अवकाश ही नहीं है । हमने बहुत बार पहले भी
आपको यह विषय समझा दिया है, उसका भी जरा स्मरण कीजिये, यो उक्त शंका का समाधान
करते हुए श्रीवसिष्ठजी कहते हैँ ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, सुनिये, जिसे आप आधिभौतिक शरीर का
आतिवाहिकरूप से परिणाम कहते हैं, वह परिणाम नहीं है, किन्तु ज्ञानोत्पत्ति से स्थूल देह के
बाधित होने पर पहले से सिद्ध स्थूल शरीर के अधिष्ठानभूत सूक्ष्म शरीर का अवशेष है । हे
श्रेष्ठतम, यह बात मैं आपसे बहुत बार कह चुका हूँ, इसे आप क्यों हृदयंगम नहीं कर रहे हैं ?
केवल आतिवाहिक ही देह है, यर्हौँ आधिभौतिक देह है ही नहीं