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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

स्ववासनाभ्रमेणैव क्वचित्केचित्कदाचन । मृतोऽयमिति पश्यन्ति केचिद्योगिनमग्रगाः ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा इस विषय को यों हृदयंगम करना चाहिये कि यद्यपि योगी जनों को अपनी दृष्टि से अपने शरीर की आतिवाहिकता का ही अनुभव होता है किन्तु उस शरीर के दर्शनसुख का उपभोग करानेवाले अष्ट से युक्त अज्ञानी लोगों की वासना से उसकी भौतिकता, मृत्यु आदि की कल्पना हो सकती है, इसलिए कोई विरोध नहीं है, इस अभिप्राय से श्रीवसिष्ठजी कहते हैं। कोई पुरोवर्ती पुरुष कभी कहीं पर अपनी वासना से उत्पन्न भ्रम से “यह मर गया" यों देखते हैं, कोई जीवित देखते हैं । अतएव विदेहमुक्त श्रीशुकदेवजी का परीक्षित की सभा में दर्शन होना और भागवतकथा का उपदेश देना संगत होता है