Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
उदेत्यसत्यमेवाशु तथा सत्यं विलीयते ।
भ्रान्तिर्भ्रमवतो रज्वामपि सर्पभ्रमे गते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
भ्रान्त पुरुष की दृष्टि में भ्रमवश असत्य
वस्तु का तुरन्त आविर्भाव होता है और सत्य वस्तु तिरोहित होती है, परन्तु सर्प की भ्रान्ति के
मिट जाने पर भी क्या फिर रस्सी में सर्प का भ्रम हो सकता है ? कदापि नहीं