Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
झटित्येव यथाकाशं भवति स्वप्नपर्वतः ।
क्रमेण वा तथा बोधे खं भवत्याधिभौतिकम् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
"तत्त्वज्ञान से बाध्य होने के कारण भी यह प्रपव सत्य नहीं है, ऐसा कहते है ।
जैसे जागरण होने पर स्वप्न का पर्वत तुरन्त शून्यता को प्राप्त हो जाता है, तनिक भी
अवशिष्ट नहीं रहता, वैसे ही तत्त्वज्ञान होने पर आधिभौतिक (प्रपंच) बोधाभ्यास क्रम से या
सहसा ईश्वर के अनुग्रह से असत् यानी शून्य हो जाता है