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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 57, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

उड्डीनोऽयं मृतो वेति पश्यन्ति निकटस्थिताः । ज्ञमातिवाहिकीभूतं स्वस्वभावहता यतः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

ऐसी अवस्था में श्रीशुकदेवजी का सूर्यमण्डलगमन और दधीचि आदि ऋषियों के मृतक शरीर का दर्शन लोगों को कैसे हुआ ? इस शंकापर कहते हैं। निकट स्थित लोग आतिवाहिकता को प्राप्त हुए (यानी जिसका आधिभौतिक शरीर बाध हो चुका है, ऐसे) तत्त्वज्ञानी को “यह उड़ गया अथवा यह मर गया" ऐसा देखते हैं, क्योकि वे स्वाभाविक अज्ञान से विनष्टप्राय हैं। भाव यह कि अपने अज्ञान से कल्पित देह को ही वे देखते हैं, ज्ञानी की देह को नहीं देखते