Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 114
एक सौ तेरहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चोौदहवाँ सर्गं अविद्या के विनाश के उपायभूत आत्मदर्शन का, विशुद्ध आत्मस्वरूप का तथा असंकल्प से वासनाक्षय का वर्णन ।
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- Verse 1वासना के क्षय के उपाय को पूछकर तन्मूलक अविद्या रूप आवरण के विनाश का उपाय पूछते हैं । श्री…
- Verses 2–4इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के पूछने पर वसिष्ठजी पहले अविद्या के क्षय का उपाय कहते हैं । श्…
- Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे धूप का आस्वाद लेने की इच्छा करनेवाली छाया का आत्मविनाश हो जाता ह…
- Verse 6जैसे सभी दिशाओं में बारह सूर्यों कु एक साथ उदित होने पर छाया अपने आप विनष्ट हो जाती है वै…
- Verse 7लेता है। उक्त मोक्ष एकमात्र संकल्प के अभाव से सिद्ध होता हे
- Verse 8मनरूपी आकाश में शुद्ध चैतन्यरूपी सूर्य का उदय होनेसे कामवासना रूपी रात्रि के थोड़ा बहुत क…
- Verse 9जैसे सूर्य भगवान् का उदय होने पर अंधेरी रात न मालूम कहाँ चली जाती है वैसे ही विवेक के उद…
- Verse 10जैसे वेताल की दृढतर वासना से वासित बालक का सन्ध्या के समय वेतालसंकल्प अपने-आप हठात् बढ़न…
- Verse 11श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, जो कुछ भी यह दृश्य वस्तुसंघात है, वह अविद्या है ओर वह अव…
- Verse 12श्री वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, विषयों के संसर्ग से रहित, सामान्य (५४5) से रहि…
- Verses 13–16उक्त आत्मा की असंभावना के निवारणके लिए कार्यसहित अविद्या के उसमें बाध दशति हैं । हे पुण्य…
- Verses 17–18यह सब नित्य, चैतन्यघन, अविनाशी, अखण्ड ब्रह्म ही है, मन नामकी कोई दूसरी कल्पना है ही नहीं…
- Verse 19जैसे समुद्र से तरंग उठती है, वैसे ही सर्वशक्तिशाली सर्वत्रगामी महात्मा इस मन रूपी देवता स…
- Verse 20अद्वितीय सर्वव्यापक शान्त आत्मा में यह सृष्टि कुछ भी नहीं है । यह परमात्मा में केवल संकल्…
- Verse 21चूँकि यह संकल्प से उत्पन्न हुई है, अत: जैसे अग्नि की ज्वाला जिससे उत्पन्न हुई उसी वायु से…
- Verse 22इस अविद्या ने पुरुष के उद्योग से होने वाले संकल्प से विषयभोग की आशा का रूप धारण किया है।…
- Verses 23–24बन्धन और मोक्ष भी मन के ही धर्म हैं, आत्मा के धर्म नहीं हैं, ऐसा कहते हैँ । 'ैं ब्रह्म नह…
- Verses 25–28यद्यपि इस आकाश में जो सुवर्ण के कमलों से भरी हुई, चंचल नीलमणिरूपी भँवरों से गुलजार, दिशाओ…
- Verse 29बन्ध-कल्पना के भेदो को विस्तारपूर्वक दशति हैं । मेँ कृश हूँ, अति दुःखित हूँ, बन्धन से जकड…
- Verse 30बन्धन से मोक्ष पाने की उपाय भ्रूत कल्पना को दिखलाते है। न मैं दु:खित हूँ, न मेरी देह है,…
- Verse 31न मैं मांस हूँ, न मैं हड्डियाँ हूँ, मैं तो देह से उत्कृष्ट कुछ और ही हूँ जिसके हृदय में ऐ…
- Verses 32–34अविद्या आदि कल्पनाओं के दूसरे दृष्टान्त कहते हैं । हे रघुवर, जैसे पृथिवी तल पर खड़ा हुआ प…
- Verses 35–39श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, यह आकाशकी नीलता न तो सुमेरु पर्वत के नीलमणि के शिखरों की…
- Verse 40श्रीवसिष्ठजी ने कहा : शून्य आकाश की नीलता गुण के समान स्थित नहीं है, पद्मराग आदि दूसरे रत…
- Verse 41प्रासंगिक प्रश्न का समाधान कर प्रस्तुत विषय को कहते हैँ । जैसे आकाशकमलिनी का निग्रह संकल्…
- Verse 42जगत् के इस भ्रम का जो कि आकाश की नीलिमा की तरह उत्पन्न हुआ है, फिर जिसका स्मरण न हो, ऐसा…
- Verses 43–44“मे नष्ट हो गया” इस संकल्प से जैसे स्वप्न में दुःख से नष्ट होता है और “में जाग गया हूँ” इ…
- Verses 45–46मैं अज्ञानी हूँ ऐसे संकल्प से यह अनादि अविद्या एक क्षण में उदित होती है ओर विस्मरण के यान…
- Verses 47–48मन का निरोध करने पर भी इन्द्रियों से वासना का उद्भव क्यो नहीं होता, ऐसी यदि कोड शंका करे,…
- Verse 49उक्त अहंभावनारूप प्रयत्न कैसे करना चाहिये, उसीको दशति हैं। जो यह पहले भी नहीं था, वह आज भ…
- Verse 50ब्रह्म से अतिरिक्त कहीं पर कोई किसी प्रकार का किसी कारण के लिए मननीय दुसरा नहीं हे, अतः न…
- Verse 51परम पौरुष का अवलम्बन कर प्रयत्न के साथ उत्तम बुद्धि से विषयभोग की आशा की भावना को समूल चि…
- Verse 52आत्मतत्त्व का अज्ञान ही जरा, मरण आदि का कारण है । जो जो वस्तु कार्य -रूप से उदित होती है,…
- Verse 53ये मेरे पुत्र हैं, मेरा धन है, यह मैं हूँ, यह मेरा घर है, इस प्रकार के इन्द्रजाल से यह वा…
- Verse 54जैसे जल में वायु द्वारा तरंग रूपी सर्प की कल्पना की जाती हे, वैसे ही इस अनन्य वासना द्वार…
- Verse 55हे तत्वज्ञ श्रीरामचन्द्रजी, परमार्थदर्शन से “मेरा, “मैं ये दोनों ही नहीं है । आत्मतत्त्व…
- Verse 56आकाश, पर्वत, द्युलोक, पृथिवी, नदियों की श्रेणियाँ, ये सब दृष्टिसमकालिक सृष्टि से पुनः पुन…
- Verse 57यह अज्ञानमात्र से उत्पन्न होती है और ज्ञान से नष्ट हो जाती हे । त्रिविध परिच्छेदवाली यह अ…
- Verse 58हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानी की दृष्टि में यह अविद्या नहीं है । आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथिवी…
- Verses 59–60रज्जु में सर्प की प्रतीतिरूपी प्रातिभासिक और व्यावहारिक ये दो विकल्प अज्ञ द्वारा ही कल्पि…
- Verse 61अनात्मा देह आदि में आत्मतत्त्व की भ्रान्ति ही सब दुःखो का निदान है, इसलिए पहले देह में आत…
- Verses 62–63जैसे काष्ठ ओर लोह परस्पर मिले रहने पर भी एक नहीं हैं और जैसे बेर और बर्तन परस्पर अत्यन्त…
- Verse 64आत्मा देहरहित है, इसलिए उसके जन्म, मरण आदि की संभावना भी नहीं है, ऐसा कहते हैं । जैसे धौं…
- Verse 65यह क्या अचम्भे की बात नहीं है ? जो सत्य ब्रह्म है, उसे तो लोग भूल गये हैं और जो असत्य अवि…
- Verse 66हे रामचन्द्रजी, आप अविद्या को यानी आत्मविस्मरण को खूब बढ़ने का मौका न दीजिये। इस अविद्या…
- Verses 67–68अविद्या असम्भावित हजारों अनर्थों को उत्पन्न करती है, ऐसा कहते हैं। मिथ्या होती हुई भी अनर…
- Verse 69इससे जल की तरंग, कमल, जलबिन्दु, छोटी-छोटी लहरों से युक्त तालाबों में मृगतृष्णा से भरी हुई…
- Verse 70इसीसे आकाश में नगर की रचना, आकाश से गिरना, आकाश में उडना आदि भ्रम, जो विचित्र ओर सुख-दुःख…
- Verse 71यदि यह अविद्या चित्तको संसारवासनाओं से पूर्ण न करे, तो यहाँ जाग्रत्, स्वप्न आदि के भ्रम…
- Verse 72मिथ्या ज्ञान के बढ़ने पर स्वप्न और उपवन की भूमियों मे रोरव, अवीचि आदि नरकं की अनर्थकारी य…
- Verse 73इस अविद्या से वेधित चित्त कमलनाल के अत्यन्त सूक्ष्म तन्तु में भी एक क्षण में समस्त संसार-…
- Verse 74इससे चित्त के अभिभूत होने पर राज्य में ही स्थित पुरुष उन-उन यातनाओं को प्राप्त होते हैं,…
- Verse 75इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, संसाररूप बन्धन मेँ डालनेवाली और सम्पूर्ण द्विताकाररूपी रंग से य…
- Verses 76–77व्यवहार के कार्य कर रहे आपकी अनुराग के विषयों में आसक्ति न हो, जैसे कि विचित्र प्रतिबिम्ब…