Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
उदेत्यज्ञानमात्रेण नश्यति ज्ञानमात्रतः ।
सन्मात्रे परिविच्छेद्या रज्ज्वामिव भुजंगधीः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अज्ञानमात्र से उत्पन्न होती है और ज्ञान से नष्ट
हो जाती हे । त्रिविध परिच्छेदवाली यह अविद्या रज्जु में सर्प की भ्रान्ति की नाई सन्मात्र से
भ्रान्ति से प्रतीत होती है