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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । अविद्याविभवप्रोत्थं निविडं पुरुषस्य हि । महदान्ध्यमिदं ब्रह्मन्कथं नाम विनश्यति ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

वासना के क्षय के उपाय को पूछकर तन्मूलक अविद्या रूप आवरण के विनाश का उपाय पूछते हैं । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, अविद्या के प्रतापसे उत्पन्न हुआ, अत्यन्त सघन आवरणरूप जो यह पुरुष का महान्‌ अन्धत्व (अंधता) है, उसका विनाश कैसे होता है 2

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तेरहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चोौदहवाँ सर्गं अविद्या के विनाश के उपायभूत आत्मदर्शन का, विशुद्ध आत्मस्वरूप का तथा असंकल्प से वासनाक्षय का वर्णन ।