Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
शून्ये एव शरीरेऽस्मिन्विलोलो जलवातवत् ।
अनन्यया वासनया त्वहंभावाहिरर्पितः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल में वायु द्वारा तरंग रूपी सर्प की कल्पना की जाती हे, वैसे ही
इस अनन्य वासना द्वारा इस शून्य शरीर में ही अहंभावरूप सर्प की कल्पना की गई है