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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 23–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 23, 24

संस्कृत श्लोक

नाहं ब्रह्मेति संकल्पात्सुदृढाद्बध्यते मनः । सर्वं ब्रह्मेति संकल्पात्सुदृढान्मुच्यते मनः ॥ २३ ॥ संकल्पः परमो बन्धस्त्वसंकल्पो विमुक्तता । संकल्पं संविजित्यान्तर्यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

बन्धन और मोक्ष भी मन के ही धर्म हैं, आत्मा के धर्म नहीं हैं, ऐसा कहते हैँ । 'ैं ब्रह्म नहीं हूँ” इस प्रकार के दृढ़ संकल्प से मन को बन्धन प्राप्त होता है । “यह सब ब्रह्म ५१ सामान्य (अविद्या) क्योकि वह सब पदार्थो की कारण है, अतः (सामान्य शब्द से कही गई है । ही है” इस प्रकार के दृढ़ संकल्प से मन मुक्त होता है । संकल्प ही मजबूत बन्धन है और संकल्प का अभाव मुक्ति है। हे श्रीरामचन्द्रजी, मैं ब्रह्म नहीं हूँ इस संकल्प को “यह सब ब्रह्म ही है! इस संकल्प से जीतकर जैसा चाहते हो वैसा करो