Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 59–60
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verses 59–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 59,60
संस्कृत श्लोक
रज्जुसर्पविकल्पौ द्वावक्षेनैवोपकल्पितौ ।
ज्ञेन त्वेकैव निर्णीता ब्रह्मदृष्टिरकृत्रिमा ॥ ५९ ॥
मा भवाज्ञो भव प्राज्ञो जहि संसारवासनाम् ।
अनात्मन्यात्मभावेन किमज्ञ इव रोदिषि ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
रज्जु में सर्प की
प्रतीतिरूपी प्रातिभासिक और व्यावहारिक ये दो विकल्प अज्ञ द्वारा ही कल्पित हैँ । ज्ञानी ने तो
एकमात्र स्वतःसिद्ध ब्रह्मदृष्टि का ही निर्णय किया हे । हे रामचन्द्रजी, आप अज्ञानी मत होड्ये,
ज्ञानी बनिये, संसारवासना का नाश कीजिये, अनात्म देह आदि मे आत्मभावना से अज्ञ की
नाई आप क्यों रोते हे ?