Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 67–68
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verses 67–68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 67,68
संस्कृत श्लोक
मिथ्यैवानर्थकारिण्या मनोमननपीनया ।
अनया दुःखदायिन्या महामोहफलान्तया ॥ ६७ ॥
चन्द्रबिम्बे सुधार्द्रेऽपि कृत्वा रौरवकल्पनम् ।
नारकं दाहसंशोषदुःखं समनुभूयते ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
अविद्या असम्भावित हजारों अनर्थों को उत्पन्न करती है, ऐसा कहते हैं।
मिथ्या होती हुई भी अनर्थ करनेवाली, मन के संकल्प से पुष्ट हुई, अन्त में महामोहरूप
फल देने वाली, दुःखदायिनी इस अविद्या से अमृतरस से सराबोर चन्द्रबिम्ब में भी रोरव नरक
की कल्पना करके पुरूष नारकीय दाह, शोष आदि दुःखों का अनुभव करता हे