Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
एतद्बुद्ध्वा यथा व्योम्नि दृश्यमानोऽपि कालिमा ।
न कालिमेति बुद्धिः स्यादविद्यातिमिरं तथा ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : शून्य आकाश की नीलता गुण के
समान स्थित नहीं है, पद्मराग आदि दूसरे रत्नों की प्रभा आकाश में नहीं दिखाई देती, इसलिए
वह सुमेरु पर्वतके नीलमणिमय शिखरों की प्रभा भी नहीं है । ब्रह्माण्ड तेजोमय है ओर तेज
प्रचुर है एवं ब्रह्माण्ड के मध्यवर्ती आकाश का ऊपरी भाग प्रकाश से व्याप्त है, इसलिए यहाँ
पर अन्धकार का सम्भव नहीं हे ॥३६, ३ ७॥
इस प्रकार दोनों पक्षों का अनुवाद कर सिद्धान्त पक्ष को कहते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, अविद्या की अनुरूप सखी के समान असन्मयी यह केवल विपूल शून्यता
ही दिखाई देती है ॥३ ८॥ नेत्रं की ही अपनी दर्शनशक्ति का क्षय होने पर जो वस्तुस्वभाव से
अन्धकार उदित हुआ है, वह आकाश की नीलता के रूप से दिखाई देता हे ॥। ३ ९॥ यह जानकर
जैसे आकाश में दिखाई देती हुई भी कालिमा “यह कालिमा नहीं है" ऐसी बुद्धि होती है, वैसे ही
अविद्या रूपी अन्धकार को भी जानिये