Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अस्याः परं प्रपश्यन्त्याः स्वात्मनाशः प्रजायते ।
आतपानुभवार्थिन्याश्छायाया इव राघव ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे
श्रीरामचन्द्रजी, जैसे धूप का आस्वाद लेने की इच्छा करनेवाली छाया का आत्मविनाश हो
जाता है, वैसे ही परब्रह्म परमात्मा के दर्शन कर रही इस अविद्या का आत्मविनाश हो जाता
है