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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 35–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verses 35–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । मेरुनीलमणिच्छाया नेयं नापि तमःप्रभा । तदेतत्किंकृतं ब्रह्मन्नीलत्वं नभसो वद ॥ ३५ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । न नाम नीलता व्योम्नः शून्यस्य गुणवत्स्थिता । अन्यरत्नप्रभाभावान्न वाप्येषा च मैरवी ॥ ३६ ॥ तेजोमयत्वादण्डस्य स्फारत्वादिव तेजसः । प्राकाश्यादण्डपारस्य तमसो नात्र संभवः ॥ ३७ ॥ केवलं शून्यतैवैषा बह्वी सुभग लक्ष्यते । वयस्येवानुरूपा या अविद्याया असन्मयी ॥ ३८ ॥ स्वदृष्टिक्षयसंपत्तावक्ष्णोरेवोदितं तमः । वस्तुस्वभावात्तद्व्योम्नः कार्ष्ण्यमित्यवलोक्यते ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, यह आकाशकी नीलता न तो सुमेरु पर्वत के नीलमणि के शिखरों की प्रभा है ओर न अन्धकार की कान्ति है, क्योंकि यदि उसे सुमेरु पर्वत के नीलमणिमय शिखर की छाया मानें, तो सुमेरु पर्वत के पद्मराग आदि मणियों के भी शिखर हैं, उनकी भी कान्ति दिखाई देनी चाहिये, पर वह नहीं दिखाई देती, इसलिए यह कल्पना ठीक नहीं हे । यदि उसे सूर्यकी किरणों से दुर्भद्य अन्धकार राशि मानें, तो ब्रह्माण्ड के ऊपर ओर नीचे के कपाल सुवर्णमय ओर रजतमय है ।* तदण्डमभवद्धेमं सहग्रांशुसमप्रभम्‌ इस प्रकार पुराणों में ब्रह्माण्ड की महाप्रकाशता सुनी जाती है ऊपर-ऊपर सत्यलोक आदि अत्यन्त चमकदारलोकों से यह ब्रह्माण्ड खप्पर व्याप्त हे । व्यवधान के न रहने पर आदित्य आदि की किरणों का सम्बन्ध नहीं रोका जा सकता, बीच में अन्धकार का संभव नहीं हे, तब किये कि वह आकाश की नीलता ((-.) किसकी है ?