Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
कस्तवायं जडो मूको देहो भवति राघव ।
यदर्थं सुखदुःखाभ्यामवशः परिभूयसे ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
अनात्मा देह आदि में आत्मतत्त्व की भ्रान्ति ही सब दुःखो का निदान है, इसलिए पहले देह
में आत्म भ्रान्ति का ही वारण करते हैँ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह जड, मूक शरीर आपका क्या है ? जिसके लिए अवश होकर सुख
ओर दुःख द्वारा आप अभिभूत हो रहे हैं