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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, Verses 17–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 114, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 114 · श्लोक 17,18

संस्कृत श्लोक

तस्मिन्नित्ये तते शुद्धे चिन्मात्रे निरुपद्रवे । शान्ते समसमाभोगे निर्विकारोदितात्मनि ॥ १७ ॥ यैषा स्वभावातिगतं स्वयं संकल्प्य धावति । चिच्चैत्यं स्वयमाम्लाना सा म्लाना तन्मनः स्मृतम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

यह सब नित्य, चैतन्यघन, अविनाशी, अखण्ड ब्रह्म ही है, मन नामकी कोई दूसरी कल्पना है ही नहीं । इन तीनों जगतों में न कोई जन्म लेता है और न कोई मरता है ओर न जन्म, मरण आदि भावविकारों का कहीं पर अस्तित्व ही है। अद्वितीय, केवल प्रकाशस्वरूप, सबमें अनुगत, सत्रूप, अखण्ड और विषय संसर्गशून्य चिन्मात्र ही यहाँ पर है। १४-१६॥ उस नित्य, सर्वव्यापक, शुद्ध, चैतन्यघन, किसी प्रकार के उपद्रवों से रहित, शान्त, सर्वत्र समदृष्टि, निर्विकार, प्रकाशमान आत्मा में जो यह आवरणसहित चिति चित्स्वभाव के विपरीत यानी जडता, परिच्छेद आदि स्वभाववाले चेत्य (विषय) की स्वयं कल्पना कर दौड़ती है, वह विक्षेप से मलिन हुई चिति ही मन नाम से कही गई है