Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 79
अठहत्तरवाँ सर्ग समाप्त उन्नायीवों सर्ग प्रबोध द्वारा स्वप्न के बाध के समान, ऋषियों तथा देवताओं के समूह के सहित विधाता के निर्वाण का वर्णन।
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, तपोलोकपर्यन्त जब समूचा प्रदेश प्रलयकालीन एक…
- Verse 2इतने में मैने प्राणादि-उपासनाओं के द्वारा सालोक्यादि मुक्ति को प्राप्त हुए तथा ब्रह्माजी…
- Verses 3–5मैंने अधिकारी देवों तथा भावितात्मा मुनियों के समूह को देखा । हे श्रीरामचन्द्रजी, उस समूह…
- Verse 6उसके बाद की घटना बतलाते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, तदनन्तर उसी स्थान पर वे प्रलय के बारह स…
- Verse 7इसके बाद मुहूर्तमात्र में मैंने सामने ब्रह्माजी को ऐसे देखा, जैसे सोकर उठा हुआ पुरुष स्वप…
- Verse 8एवोक्त विधाता के पारिवारिक लोगों में भी ऐसा ही केवल्य हआ. यह कहते हैं / ब्रह्माजी के परिव…
- Verse 9हे श्रीरामचन्द्रजी, ब्रह्माजी के चरम-साक्षात्कार के समय सबके विदेह कैवल्य को प्राप्त हो ज…
- Verse 10हे श्रीरामचन्द्रजी, ऋषि, मुनि, देव, सिद्ध तथा विद्याधर आदि वे सभी वैसे ही उस समय शृन्यरूप…
- Verse 11नामरूप से शून्य भाव को प्राप्त होने पर भी स्वरुप से तो वे सबके सव निर्वाण रूप से ही स्थित…
- Verse 12वास्रनाकल्पित रुप का नाश हो जाने से वही उनकी वास्तवस्वरूप की प्राप्ति है, इस आशय से कहते…
- Verse 13उसीका पुनः उपपादन करते हैं / हे श्रीरामजी, चिदाकाशरूप यह शरीर वासना के कारण ही स्पष्ट भास…
- Verse 14जैसे स्वप्न मे आकाशगामी यह शरीर दीखता है, किन्तु जाग्रतकाल में नहीं दीखता, वैसे ही वासना…
- Verse 15स्वप्न से उठने पर जाग्रतकाल में एकमात्र स्वाध्निक भौतिक पदार्थों का बाध होता है, लेकिन तत…
- Verse 16हे श्रीरामचन्द्रजी, इस विषय में स्वप्न का अनुभव ही दृष्टान्तरूप से लक्षित है । यह वृद्ध स…
- Verse 17इस तरह अपने तथा दूसरें के अनुभव से सिद्ध स्वप्न के बाध का जो अपलाप करता है यानी स्वप्नावि…
- Verse 18फिर भी इस विषय में स्वप्न का द्ष्टान्त तो उचित नहीं है, क्योकि यह जो वर्तमान शरीर हैं इसम…
- Verse 19पिता आदि का शरीर जिर देह का कारण है उम्र देह को भी सर्वथा असद्रप माननेपर तो (=) देखिये यह…
- Verse 20पृथिवी आदि पंचभूतों के सावयव होने से विभागों का अवसान हो जानेपर संयोग का विनाश ध्रुव है अ…
- Verse 21यहाँ पर ग्रसगवथ चावकि मत का भी खण्डन करने के लिए अनुवाद करते हैं । पृथिवी आदि जो चार भूत…
- Verse 22तब तो (*) सम्पूर्ण वस्तुओं का संक्षय बतलानेवाले (4) अठारह पुराण, महाभारत आदि इतिहास, ऐहिक…
- Verse 23यदि यह कहो कि हम देहात्मवादी चार्वाकों के मत में उन वेदादि शास्त्रों की व्यर्थता और अप्रा…
- Verse 24तुम्हारे कथन को लोक में विद्वान लोग स्वीकार नहीं करते, क्योकि बिना कारण और प्रयोजन के सृष…
- Verse 25यदि ऐसा मान लिया जाय कि जैसे मदशक्ति-आत्मक द्रव्य में मदशक्ति विद्यमान रहती है वैसे ही भू…
- Verse 26यह पिशाचादि की कल्पना भी भ्रान्ति ही है, क्योकि पिशाचो को हमने अपनी आँखों के सामने उपस्थि…
- Verse 27ठीक हैं, ऐसा ही सही, इससे आपको क्या लाभ हैं, यह कहते हैं / इस तरह यदि तुम शब्द का प्रामाण…
- Verse 28(अथ साऽपि मुधा भ्रान्ति० यह जो ऊपर कलन हैं, उसमें दोष दिखलाते है / अन्य शरीर में स्थित पि…
- Verse 29सर्वजन प्रसिद्ध ज्ञानो का स्वतः प्रामाण्य होने से "पिशाच है" यदि यह संवित् सत्यार्थ है,…
- Verse 30और सुनो, पिशाचग्रस्त की पैशाची ज्ञप्ति श्रुति समान किसी दृढ़तर प्रमाण से जन्य नहीं है, कि…
- Verse 31एकमात्र अपने अनुभव के बल पर अर्थेलत्ता का निश्वय नही किया जा सकता, क्योकि युक्ति में रजत…
- Verse 32जीवितदशा में देह के उपस्थित रहने पर श्रुति आदि प्रमाण के बल से अथवा मृतदशा में देह के उपस…
- Verse 33यदि वह चावकि यह कहे कि कायाकार में परिणत हुए शर्वो से संवित् क्रा उद्भव होता है, इसलिए श…
- Verse 34अतएव एकमात्र वासना के क्षय से ही सूष्ष्मशरीरक्षय द्वारा सम्पूर्ण अनर्थो का क्षय सिद्ध है,…
- Verse 35हे श्रीरामचन्द्रजी, सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा को संसार रचने की इच्छा (00) उत्पन्न हो…
- Verse 36यह किये कि वासना उत्पन्न केसे हुई ? श्रह्मसे तो वह उत्पन्न हुई नहीं; क्योकि उसके तो 4तदेत…
- Verse 37बिना असग अद्रय व्रह्म का श्रुतियों से परिज्ञान किये कासना की अनुत्पत्ति बतलाना उचित नहीं…
- Verse 38विज्ञानघन यह आत्मा ही प्रकाशात्मक और अप्रकाशात्मक भी है । ज्ञात होने पर यह स्वयं ही स्वप्…
- Verse 39'मैं बद्ध हूँ” इस भावना से बन्धदर्शन और भे नित्यमुक्त हूँ", इस भावना से मोक्षदर्शन जब आत्…
- Verse 40इस्रको परीक्षक लोग व्युत्थान और समाधि तथा व्युत्थान और झुष्गप्ति के द्वारा स्पष्ट देख सकत…
- Verse 41सुप्त ओर अजड वेदन "मोक्ष" कहलाता है तथा प्रबुद्ध वेदन को तत्त्वज्ञानी लोग बन्ध कहते हैं इ…
- Verse 42हे श्रीरामचन्द्रजी, बन्ध -मोक्ष आदि की सारी शंकाएँ छोडकर आप निवार्णरूप, वासनाशून्य, अनन्त…