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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

काकतालीयवद्देहात्पैशाची ज्ञप्तिरस्ति चेत् । परलोकार्थसंवित्तिः कथं नास्ति सकारणा ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

और सुनो, पिशाचग्रस्त की पैशाची ज्ञप्ति श्रुति समान किसी दृढ़तर प्रमाण से जन्य नहीं है, किन्तु 'काकतालीय' न्यायवत्‌ आकस्मिक है-अचानक उदित हुई है । ऐसी ज्ञप्ति भी यदि स्वानुभूत होने से प्रमा है, तो फिर श्रुति आदि दृढ़तर कारणों के सहित विद्यमान परलोकार्थ संवित्‌ भला प्रमा क्यों नहीं है