Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
अथ सापि मुधा भ्रान्तिर्यावद्देहं प्रदृश्यते ।
इति चेत्तन्मुधा नाम सत्यमित्येव वो भवेत् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह पिशाचादि की कल्पना भी भ्रान्ति ही है, क्योकि पिशाचो को हमने अपनी
आँखों के सामने उपस्थित हुए आजतक नहीं देखा और हमारे मत में प्रत्यक्ष के सिवा ओर कोई
दूसरा प्रमाण है ही नहीं । प्रत्यक्षातिरिक्त दूसरे प्रमाण की संभावना ही नहीं है, क्योंकि सैकड़ों बार
पार्थिवत्व ओर लोह-लेख्यात्वादि का सहचारग्रह होने पर भी वज़मणि आदि में व्यभिचार देखा
गया है । उत्पातादि अन्य समय में गाय के पेट से गदहे की उत्पत्ति भी देखी गई है तथा देवतादि की
प्रतिमाओं से भी बिना अग्नि के भी धूम्र उठते देखा गया है । तथा सर्वत्र लिंगों में देशान्तर ओर
कालान्तर में व्यभिचार शंका का निवारण नहीं किया जा सकता, इसलिए आप के अनुमान प्रमाण
का तो बिलकुल योग नहीं है । सादृश्य के विषय में यत्किंचित् या पूर्ण-यों विकल्प होने से उपमान
प्रमाण का योग नहीं बैठता । इसी तरह अर्थापत्ति ओर अनुपलब्धि भी प्रमाण नहीं हो सकते ।
पिशाचग्रस्त पुरुष का पिशाचवाग्व्यवहार भी जब तक देह विद्यमान रहता है तभी तक दीखता है
उसके मरण के बाद नहीं । इसलिए उस देह को ही सान्निपातिक भ्रान्ति की तरह भ पिशाचग्रस्त
हूँ, यह व्यर्थ की भ्रान्ति है । यदि यह सब तुम कहो, तो तुम्हारा यह सब कहना व्यर्थ ही है, क्योकि
(भ) प्रलय, धर्माधर्म एवं आत्मतत्त्वरूप अर्थ मेँ ।
तुम्हारी ही बातों से इन सबका खण्डन हो जाता है । इसमें प्रबल कारण यह है-प्रत्यक्ष के
अतिरिक्त यदि सभी अप्रमाण हैं, तो फिर चार्वाक का वाक्य भी प्रमाण नहीं हो सकता, क्योकि वह
भी प्रत्यक्ष के अतिरिक्त है । चूँकि अनुमान प्रमाण को तुम मानते नहीं हो, इसलिए युक्ति से तुम
अपने मत का तो कदापि समर्थन नहीं कर सकते, क्योकि अनुमान रूप होने से वे युक्तियाँ भी
प्रमाण नहीं हो सकर्ती । दृष्टान्त तो तुम दे ही नहीं सकते, क्योकि सादृश्य के उपमानगम्य होने से
वह तुम्हारे मत से प्रमाण के बाहर है । स्वपक्ष में अनुकूल और परपक्ष में प्रतिकूल तर्क भी तुम नहीं
उपस्थित कर सकते, क्योकि तर्क के अन्वय-व्यतिरेकव्याप्तिघटित होने के कारण उसे तुम
स्वीकार नहीं कर सकते । आपत्ति और व्यतिरेक ये दोनों अनुपपत्ति ओर अनुपलब्धि के अधीन
रहते हैं, इसलिए यदि इनका तुम स्वीकार करते हो, तो तुम्हें अर्थापत्ति और अनुपलब्धि को प्रमाण
रूप से स्वीकार अनिवार्य होगा । अतः ये जो छः प्रमाण हैं, वे सबके सब सत्य हैं, यह तुम चार्वाकों
को मानना ही पड़ेगा