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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

न पिशाचप्रमा सत्या मदशक्तिमतोऽपि हि । प्रतिभास्य न सत्या स्यात्परलोकात्मिका कथम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

(अथ साऽपि मुधा भ्रान्ति० यह जो ऊपर कलन हैं, उसमें दोष दिखलाते है / अन्य शरीर में स्थित पिशाच की-सबके अनुभव से सिद्ध पिशाचग्रस्त शरीर मे पिशाचविषयिणी- प्रमा ज्ञानों के स्वतः प्रामाण्य होने से ही लोक में सत्यरूप से प्रसिद्ध हैं वह भी यदि सत्य न प्रमाणित हुई, तो फिर मदिरा पीकर उन्मत्त बने हुए पुरुष की प्रतिभा भी कदापि सत्य प्रमाणित न होगी, जो मदशक्ति-समन्वित द्रव्यगत मदशक्तिविषयक है । अमत्त पुरुषों के अनुभवसिद्ध अर्थों का खण्डन करनेवाले तुम ठहरे, तुम्हारी प्रमत्त पुरुष की प्रतीति से सिद्ध मदशक्ति का दूसरा कोई कैसे नहीं खण्डन कर सकता ? ऐसी दशा में तुम्हारी दृष्टान्त असिद्धि के कारण ज्ञान में भूतगुणत्व की सिद्धि न हो सकने से परलोकात्मक स्थिति का यानी स्वर्गनरकादि स्थिति का तुम भला कैसे खण्डन कर सकते हो ?