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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

यान्तर्वेत्ति यथा संवित्सा तथानुभवत्यलम् । अस्तु सत्यमसत्यं वा सिद्धमित्यनुभूतितः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र अपने अनुभव के बल पर अर्थेलत्ता का निश्वय नही किया जा सकता, क्योकि युक्ति में रजत का अनुभव होने पर भी उसमें अर्थसत्ता नही दीखती, यह आशंका कर कहते हैं / जो संवित्‌ जिस पदार्थ की सत्ता को अपने भीतर जैसी जानती है उस पदार्थ की सत्ता को वह अपने भीतर वैसी ही भलीभाँति अनुभव करती है। शुक्ति रजतसंवित्‌ स्वप्रतिभासकालिक अर्थसत्ता का अवगाहन करती है, परन्तु पूर्वकाल की संवित्‌ का जब “यह रजत नहीं है” इस उत्तरकाल की संवित्‌ से बाध हो जाता है तब यह उत्तरकाल की बाधसंवित्‌ सीप में चाँदी की त्रैकालिक असत्ता बतलाती हे । ऐसी स्थिति में प्रथम संवित्‌ के बल से रजत में प्रातिभासिक सत्ता रहे या द्वितीय संवित्‌ के बल से असत्ता रहे, इसमें कोई हानि नहीं है, क्योकि अनुभव से दोनों ही सिद्ध है । (अनुभव का सहारा लिये बिना अर्थ के रूप का अपलाप करना कोर्ड बच्चों का खेल नहीं ह)