Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
उत्पन्नैव च सानादौ परब्रह्मण्यसंभवात् ।
उत्पन्ना समयाद्यासौ ब्रह्मैव परमेव सत् ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह किये कि वासना उत्पन्न केसे हुई ? श्रह्मसे तो वह उत्पन्न हुई नहीं; क्योकि उसके तो
4तदेतदुब्ह्मापूर्वनपरमनन्तरमबाह्मग् इत्यावि श्रुतियों से कारण होने का निषेध है तथा असग
कूटस्थ और अद्वय ग्रतिपादक श्रुतियाँ भी इसी का समर्थन करती हैं / पूर्वककल्पीय जग्रत् से वह
वासना उत्पन्न होती हैं, यह भी नहीं कह सकते, क्योकि जो प्रलयकाल मे स्वयं नष्ट हो जाता है
उसमें दूसरे को पैदा करने की शक्ति ही कहाँ रह सकती है 2 यदि यह काहिये कि प्रलय में जग्रत्
नष्ट नहीं होता, वह स्वयं ही चरमभाव विकार से सूक्ष्म होकर स्थित रहता है, इसलिए उसकी उस
तरह की स्थिति ही वासनात्मक प्रलय है, तो यह भी आप नहीं कह सकते, क्योंकि इस पर में
आपसे यह पुख्ता हूँ कि केकी जयत् की स्थिति क्या प्रलय में अपनी सत्ता से रहती हैं या बह्मकी
सत्ता से ? यदि आप यह के कि अपनी चत्ता से रहती है, तो आपके इस पक्ष में सदेव सोम्येदमग्र
आस्रीदेकमेवाब्रितीयग् इत्यादि श्रुतियों से विरोध पड़ता ह / अव रहा आपका दूसरा पक्ष, इसमें
हमारा यह कहना है कि जो स्वतः असक् है वह भला दूसरे की सत्ता से स्थित रहता है यह कहना
तो एक जकर्दस्ति मिथ्या ग्रलाप ही होगा न 2 इसलिए दोनों पक्ष में छृष्टि और प्रलय में कोर्ड विशेष
आपत्ति न होने से अभास्रमान की स्ता प्रश्निद्धि के अभाव में जयत् नष्ट होता है और स्थित भी
रहता हैं, यह कहना तो वदतों व्याघात“ दोष से ग्रस्त ही हैं / ठीक हैं, यह सब आपका कथन हम
मान रहे हैं / सुनिये, प्रलय या पूवर्या में वह वासना उत्पन्न ही हैं, यह आप कैसे कहते हैं; यह तो
(&) अर्थात् चूँकि वेदादि प्रमाण सिद्ध हो गया है तथा ज्ञानों में स्वतः प्रामाण्य की सिद्धि हो चुकी
है, इसलिए।
(0) “तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय” - इत्यादि श्रुति देखिये ।
आप कह नहीं सकते कि वह वासना उत्पन्न ही है, क्योकि असगर अद्रय फखरह्य में अनुत्पत्ति तो
आप पहले ही कह बुके हैं / फिर भी अद्वितीय ब्रह्मबोध के उपायरूय से जब तक बोध नहीं हो
जाता, तब तक के लिए आप कृपाकर वह कासना भी पहले किसी एक निमित्त से अवश्य उत्पन्न
हुई है, यह स्वीकार कर लीजिये, क्योंकि बिना कारण के जगत् की उत्पत्ति नहीं होती, यह
शाख़सिद्ध है /
हाँ, ब्रह्मज्ञान हो जाने के बाद तो फिर सारा संसार ही सद्रूपब्रह्म है और वह वासना भी
परब्रह्मस्वरूप ही है