Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
एवं चेत्तत्परो लोकः सत्स्वर्गनरकादिकम् ।
इत्येषापि न संवित्किं सत्यतामुपगच्छति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक हैं, ऐसा ही सही, इससे आपको क्या लाभ हैं, यह कहते हैं /
इस तरह यदि तुम शब्द का प्रामाण्य मान लेते हो, तो फिर निर्दोष श्रुति को तुम्हें प्रमाण माननें
में कोई आपत्ति न होगी । जब श्रुति प्रमाण है तब "परलोक, स्वर्ग, नरक आदि सब सत् है'-
इत्याकारक श्रुतिजन्य संवित् भी क्यों न सत्यता को यानी प्रामाण्य को प्राप्त होगी ? कहने का
तात्पर्य यह कि यदि अन्य के बोध के लिए शब्द प्रमाण हे, तो फिर परलोक, स्वर्ग, नरक तथा उनके
प्रतिपादक श्रुति, स्मृति आदि शब्द भी क्यो न सत्य प्रमाण होंगे ? क्योकि जितने ज्ञान हैं उनमें
स्वतः प्रामाण्य है, इसमें तो किसी को भी विवाद नहीं है, हाँ, यह बात दूसरी है कि कारणदोष तथा
बाधक ज्ञान से उसका कहीं पर अपवाद हो जाता है । लेकिन यहाँपर तो न कोई कारण में दोष है
और न “स्वर्ग, नरक आदि नहीं है” ऐसा बाधक प्रमाणज्ञान ही है