Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
न कदाचिज्जगन्नाशो देहोद्भूतगुणादिकम् ।
मदशक्तिरिव ज्ञप्तिरुदेतीति च वक्षि चेत् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ पर ग्रसगवथ चावकि मत का भी खण्डन करने के लिए अनुवाद करते हैं ।
पृथिवी आदि जो चार भूत हैं वे ही चार प्रकार के देहाकार से तथा घट, पट आदि के आकार
से सम्मिलित होकर "जगत" नाम से कहे जाते हैं पृथिवी आदि भूतस्वरूप होने के कारण उस
जगत् का कभी नाश नहीं होता । जब ये चारों भूत एक जगह मिल जाते हैं तब ज्ञान तथा इच्छा
आदि गुणोंवाला इन चारों के धर्मों का समुदायरूप एक शरीर तैयार हो जाता है, जिसमें हाथ, पैर
आदि अनेक अवयव विद्यमान रहते हैं। और वह शरीर भी उस हाथ, पैर आदि अनेक अवयवों की
नाना प्रकार की रचनाओं के कारण मनुष्य, पशु, पक्षी आदि अनेक जाति का हो जाता है । तथापि
इन चारों भूतों के मध्य में किसी भी एक भूत में ज्ञप्ति नहीं दिखाई देती तथापि जिन द्रव्यो से मदिरा
तैयार की जाती है उन्हें पीसकर जल तथा नमक के साथ एकत्र मिला दिये जाने पर उन एकत्र मिले
हुए द्रव्यों में जैसे कालपाकादि द्वारा मदशक्तिरूप एक विलक्षण गुण आविर्भूत हो जाता है उसी
तरह देहाकार में परिणत हुए पृथिवी आदि इन चारों भूता में ज्ञप्तिरूप गुण आविर्भूत हो जाता है ।
इसलिए ज्ञप्ति तथा इच्छा आदि गुणों से सम्पन्न यह शरीर ही आत्मा है । भाई चार्वाक, यदि यह
तुम कहते हो तो इसका उत्तर सुन लो