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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 37

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

एतावद्यत्परिज्ञानं तन्निर्वाणं विदुर्बुधाः । यदत्रैवापरिज्ञानं तं बन्धं विद्धि राघव ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

बिना असग अद्रय व्रह्म का श्रुतियों से परिज्ञान किये कासना की अनुत्पत्ति बतलाना उचित नहीं है / ब्रह्म का परिज्ञान हो जाने पर तो सम्पूर्ण संशयो के बीजभूत अज्ञान का उच्छेद हो जाने से निर्वाण ही सम्पन्न हैं / इसलिए वासना की उत्पत्ति आदि में अनुपपत्ति की शंका करना ठीक नहीं है, इस आशय से कहते हैं / इतना जो यह परिज्ञान है उसीको तत्त्वज्ञ लोग निर्वाण कहते हैं । इसलिए हे राघव, इस ब्रह्म के विषय में जो प्राणी का अपरिज्ञान है उसी को आप बन्ध समझिये