Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
संविदुद्वोधने बन्धस्तदनुद्वोधने शिवम् ।
असत्सद्वज्जगद्भाति संविदुद्वोधनोदरम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
इस्रको परीक्षक लोग व्युत्थान और समाधि तथा व्युत्थान और झुष्गप्ति के द्वारा स्पष्ट देख
सकते है इस आशय से कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, संवित् को यानी चित्त की वृत्ति को बहिर्मुख कर देने पर बन्ध ओर उसको
समाधि द्वारा आत्मा में लीन कर देने पर निर्वाण प्राप्त होता है । संवित् के उद्बोधनरूपी उदरवाला
यह असत् संसार सत् के समान भासता है । इसका तात्पर्य यह है कि चित्तवृत्ति को बहिर्मुख कर
देने पर यह असत् संसार सत् के समान भासित होता है